तू किसी रेल-सी गुज़रती है/ दुष्यंत कुमार

मैं जिसे ओढ़ता-बिछाता हूँ वो ग़ज़ल आपको सुनाता हूँ  एक जंगल है तेरी आँखों में मैं जहाँ राह भूल जाता हूँ  तू किसी रेल-सी गुज़रती है मैं किसी पुल-सा थरथराता हूँ  हर तरफ़ ऐतराज़ होता है मैं अगर रौशनी में … Continue reading तू किसी रेल-सी गुज़रती है/ दुष्यंत कुमार

नज़्म उलझी हुई है सीने में / गुलज़ार

नज़्म उलझी हुई है सीने में  मिसरे अटके हुए हैं होठों पर उड़ते-फिरते हैं तितलियों की तरह लफ़्ज़ काग़ज़ पे बैठते ही नहीं कब से बैठा हुआ हूँ मैं जानम सादे काग़ज़ पे लिखके नाम तेराबस तेरा नाम ही मुकम्मल है इससे बेहतर भी नज़्म … Continue reading नज़्म उलझी हुई है सीने में / गुलज़ार